गुनगुनाती रही गीत आँगन की कलियाँ,
चलो सभ्यता के नये गीत गाए।
सरल शब्द मानो सरल व्याकरण है,
गाँव में शाम का इक नया आवरण है,
गाँवों में मंदिर और मंदिर में पूजा,
चलो थाल पूजा की फिर हम सजाए,
चलो सभ्यता के.......।
झुर - झुर बहे पुरुवा पनघट किनारे,
बात पानी में करते हैं चन्दा सितारे,
दीपों की लड़ियाँ और गीतों की कड़ियाँ,
चलो गाँव से हम शहर में लुटाए,
चलो सभ्यता के.......।
©अतुल कुमार यादव