प्रथम विलाप थकन मत देखो तजकर आगे बढ़ जाऊँगा,
हारा हुआ मुझे मत समझो जीत साथ लेकर आऊँगा।
स्वागत करना था सावन का लेकिन मैं लाचार हुआ हूँ,
नश्वरता में खोकर अब तो जीवन की पतवार हुआ हूँ।
छूट गये हैं भाव हमारे टूट गयी हैं अभिलाषायें,
मन की पीड़ा तड़प रही है मन की पीड़ा किसे सुनायें?
सपनों को मैं साध चुका हूं अहसासों में सध जाऊँगा,
हारा हुआ मुझे मत समझो जीत साथ लेकर आऊँगा।।
वेद पुराण धर्म सब झूठे खाली हाथ बढ़ा पाया हूँ,
मन मंदिर के देवों को मैं केवल अश्रु चढ़ा पाया हूं।
टूट टूट कर रहा बिखरता बूदों के जैसे जुड़ता हूँ,
वैरागी मन अपना लेकर विस्मृतियों में ही मुड़ता हूँ।
चिन्तन मंथन ग्रंथन में अब अपना समय लगा पाऊँगा,
हारा हुआ मुझे मत समझो जीत साथ लेकर आऊँगा।।
जीवन की खेती में अब तक हमने तो आँसू बोये हैं,
संघर्षों की यादों में ही अपने पॉवों को धोये हैं।
आँसू पीड़ा आहों में अब हमने दहना सीख लिया,
अभिशापों को गले लगाकर हमने रहना सीख लिया।
परम्परा औ रिश्ता क्या है ? बन्धन में बध जाऊँगा,
हारा हुआ मुझे मत समझो जीत साथ लेकर आऊँगा।।
अरमानों की गठरी बाँधें मानों पॉव निकल पड़ते हैं,
खुद को पाने की चाहत में पॉव हमारे चल पड़ते हैं।
थकी कल्पना टूटे सपने राहों में शामिल हो जाते,
शोर मचाते सन्नाटों में कदम हमारे ठहर न पाते।
जीवन की मुश्किल राहों पर कदम बढ़ा तो बढ़ जाऊँगा,
हारा हुआ मुझे मत समझो जीत साथ लेकर आऊँगा।।
©अतुल कुमार यादव