Friday, 17 August 2018

बिटिया का वर

बढ़ी  गरीबी  चढ़ी  उधारी  केवल  नाखून  नोंच  रहे  हैं,
बिन चप्पल में बाबूजी अब बिटिया का वर खोज रहे हैं।

गाँव नगर औ शहर शहर में  कोई  फर्क नहीं दिखता है,
कोसों  दूर  भले  हो  जाना  मानो  अब तो घर लगता है,
धारायें  विपरीत  हुयीं  सब  बाबूजी  का  मन  कहता है,
थके हार कर शाम ढले भी  घर आना बोझिल लगता है,
बिटिया के  सम्मुख  जाने  से  पहले  आंसू  पोंछ  रहे हैं,
बिन चप्पल में बाबूजी अब बिटिया का वर खोज रहे हैं।

आंखों में बिटिया की   चिंता   इनमें  नींद कहां आती है,
अम्मा  भी  चिंता में  डूबी   पल   भर चैन कहां पाती है,
रोज   रोज  की   बातें   सारी  रोज  रोज  मिट जाती है,
विश्वासों   की  गठरी   देखों   कितना  नाच   नचाती है,
दिन भर दौड़ दौड़ कर अब तो बिटिया घर खोज रहे हैं,
बिन चप्पल में बाबूजी अब बिटिया का वर खोज रहे हैं।

पीड़ायें  कितनी  दुखदायी  उर  में बस छलका करती हैं,
आहें भी बाबू के दिल की  अब तो घुट घुट कर मरती हैं,
अपनी  निर्धनता  लाचारी  के  दुखड़े  वो  किसे  सुनायें,
उद्वेलित  उत्कंठा  मन  की  घर  में  कैसे  आज दिखायें,
अभी  पसीना  माथे  का  वो  खुद  कपड़े में पोंछ रहे हैं,
बिन चप्पल में बाबूजी अब बिटिया का वर खोज रहे हैं।

अपने अरमानों का  सौदा  मुश्किल  होता  है कर पाना,
होता अक्सर  पीड़ादायी  बिटिया  का घर से घर जाना,
जीवन  की  यह  रीत  बड़ी  है  इसको  यहीं निभाना है,
भीगी आंखों से  बिटिया  का  इक  दिन बोझ उठाना है,
कहाँ किधर कब कैसे निकलें मन ही मन में सोच रहे हैं,
बिन चप्पल में बाबूजी अब बिटिया का वर खोज रहे हैं।
                                              ©अतुल कुमार यादव