भीड़ में प्रियतम तुम्हारे गीत गाये जा रहा हूँ,
प्यार के अहसास के दीपक जलाये जा रहा हूँ।
बेदखल है नींद मेरी ख़्वाब झूठे गढ़ रहा हूँ,
ख्वाहिशों को मारकर मैं बस तुम्हें ही पढ़ रहा हूँ,
दर्द बिल्कुल अनसुना है आंसुओं का धड़ रहा हूँ,
धड़कनों का साथ पाकर आज आगे बढ़ रहा हूँ,
लौटकर फिर दूर से मैं पास तुम तक आ रहा हूँ,
प्यार के अहसास के दीपक जलाये जा रहा हूँ।
मुश्किलों में ज़िंदगी है ज़िंदगी में जान है तू,
भाग्य की बदली दिशा है वक्त की पहचान है तू,
धूप से हमको बचाती छाँव से अन्जान है तू,
और धुँधली सलवटों पर रोशनी की शान है तू,
ज़िंदगी की डोर थामे बस तुम्हें ही गा रहा हूँ,
प्यार के अहसास के दीपक जलाये जा रहा हूँ।
बैठकर पैगाम लिख दूँ ज़िंदगी के नाम लिख दूँ,
भाग्य की सीढ़ी लगाकर जीत का अंज़ाम लिख दूँ,
जो अधूरी रह गई है राह की हर आस लिख दूँ,
शुष्क मरुथल जो पड़ी है जीत की हर प्यास लिख दूँ,
ज़िंदगी के मोड़ पर अब ठोकरें ही खा रहा हूँ,
प्यार के अहसास के दीपक जलाये जा रहा हूँ।
पूर्ण होकर भी अधूरी रह गई है जीत मेरी,
और विरहन लग रही है ज़िंदगी की प्रीत मेरी,
चंद कदमों को बढ़ाकर काटनी है रात मेरी,
अब बुलन्दी तक चलेगी देखना हर बात मेरी,
सुलझनों की जीत में मैं बस तुम्हें ही पा रहा हूँ,
प्यार के अहसास के दीपक जलाये जा रहा हूँ।।
©अतुल कुमार यादव