ख़नकती जब सुबह में है तुम्हारे हाथ की चूड़ी,
जगा देती हमें पल में ख़नक से हाथ की चूड़ी।
चमक ऐसी जड़ी इनमें लगे चन्दा सितारा है,
दिये की रौशनी लगती कभी ये हाथ की चूड़ी।
बनाती ख़ूबसूरत हैं बढ़ाती हाथ कि शोभा,
सुहागन हैं दिखाती अब तुम्हें ये हाथ की चूड़ी।
हरी नीली गुलाबी लाल हाथों पर सजी ऐसे,
ख़ुशी का रंग हो जैसे तुम्हारे हाथ की चूड़ी।
कहीं सोना कहीं चाँदी कहीं पर काँच की दिखती,
अलग पहचान रखती हैं तुम्हारे हाथ की चूड़ी।
बुरा होने को जब होता ये पहले टूट जाती हैं,
करे आग़ाह तुमको ही तुम्हारे हाथ की चूड़ी।
जगाती जो रही अब तक सुनाकर ख़ुद ख़नक दिल की,
अतुल को भा गयी है अब उन्ही के हाथ की चूड़ी।।
©अतुल कुमार यादव
जगा देती हमें पल में ख़नक से हाथ की चूड़ी।
दिये की रौशनी लगती कभी ये हाथ की चूड़ी।
सुहागन हैं दिखाती अब तुम्हें ये हाथ की चूड़ी।
ख़ुशी का रंग हो जैसे तुम्हारे हाथ की चूड़ी।
अलग पहचान रखती हैं तुम्हारे हाथ की चूड़ी।
करे आग़ाह तुमको ही तुम्हारे हाथ की चूड़ी।
अतुल को भा गयी है अब उन्ही के हाथ की चूड़ी।।
©अतुल कुमार यादव