चल फकीरा देश पिया के चल फकीरा चल,
चल फकीरा देश पिया के चल फकीरा चल|
चल फकीरा देश पिया के यहां तो सारे मतवाले है,
संस्कृति सभ्यता खोकर के दिल में नफरत पाले है,
मम्मी पापा भैया भाभी सबकी याद सताती है,
रात रात भर सारी यादें हमको बहुत रुलाती है,
गॉव की माटी गांव की खुश्बू कैसे हमें सुलाती है,
गॉव समाज की सारी यादें हमको पास बुलाती है
हाथ में हाथ को डाले पिया तू हमको दे दे मन,
चल फकीरा देश पिया के चल फकीरा चल,
चल फकीरा देश पिया के चल फकीरा चल|
चैत मास में बादल बरसे बरबस बोल रहा है मन,
सावन में कोयलिया कुहुके सोच सोच कर डोले मन,
घर आँगन वो छूट गया क्यूँ सपने लेकर निकले थे,
बोझिल शामों में तब आशाओं के दीपक निकले थे,
कल-कल करके बहते झरने अब तो है खामोश हो गये,,
दर्द के मारे मेरे पिया सब उत्सव भी मदहोश हो गये,
अरे बात बात में मेरे पिया अब दे दे मेरा मन,
चल फकीरा देश पिया के चल फकीरा चल,
चल फकीरा देश पिया के चल फकीरा चल|
रंग रूप और शक्ल हमारी देखो बदल चुकी है,
सब हासिल कर लेने पर भी दुनिया रूकी रूकी है,
हमें हमारे देश छोड़ दो अब और नहीं कुछ कहना जी,
बहती लहरों के संग संग में तुम भी बहते रहना जी,
मिल जायेगा कोई सहारा देश में चलते रहना जी,
मन आकुल व्याकुल है मेरा मुझको नहीं सम्भलना जी,
विदा विदा ही विदा विदा अब मेरा बोल रहा तन मन,
चल फकीरा देश पिया के चल फकीरा चल,
चल फकीरा देश पिया के चल फकीरा चल||
✍©अतुल कुमार यादव
चल फकीरा देश पिया के चल फकीरा चल|
चल फकीरा देश पिया के यहां तो सारे मतवाले है,
संस्कृति सभ्यता खोकर के दिल में नफरत पाले है,
मम्मी पापा भैया भाभी सबकी याद सताती है,
रात रात भर सारी यादें हमको बहुत रुलाती है,
गॉव की माटी गांव की खुश्बू कैसे हमें सुलाती है,
गॉव समाज की सारी यादें हमको पास बुलाती है
हाथ में हाथ को डाले पिया तू हमको दे दे मन,
चल फकीरा देश पिया के चल फकीरा चल,
चल फकीरा देश पिया के चल फकीरा चल|
चैत मास में बादल बरसे बरबस बोल रहा है मन,
सावन में कोयलिया कुहुके सोच सोच कर डोले मन,
घर आँगन वो छूट गया क्यूँ सपने लेकर निकले थे,
बोझिल शामों में तब आशाओं के दीपक निकले थे,
कल-कल करके बहते झरने अब तो है खामोश हो गये,,
दर्द के मारे मेरे पिया सब उत्सव भी मदहोश हो गये,
अरे बात बात में मेरे पिया अब दे दे मेरा मन,
चल फकीरा देश पिया के चल फकीरा चल,
चल फकीरा देश पिया के चल फकीरा चल|
रंग रूप और शक्ल हमारी देखो बदल चुकी है,
सब हासिल कर लेने पर भी दुनिया रूकी रूकी है,
हमें हमारे देश छोड़ दो अब और नहीं कुछ कहना जी,
बहती लहरों के संग संग में तुम भी बहते रहना जी,
मिल जायेगा कोई सहारा देश में चलते रहना जी,
मन आकुल व्याकुल है मेरा मुझको नहीं सम्भलना जी,
विदा विदा ही विदा विदा अब मेरा बोल रहा तन मन,
चल फकीरा देश पिया के चल फकीरा चल,
चल फकीरा देश पिया के चल फकीरा चल||
✍©अतुल कुमार यादव