सफर पर जा रहा हूँ मैं यही सबको खबर देना,
तुम्हें लिखता रहूँ पैगाम बस इतनी नजर देना|
हमारे अश्क जो बरसात से दिखते हैं' आँखों में,
हमेशा ही लबों पर तुम हँसी-शय का असर देना|
किसी की बद्ददुआओं से मेरा कुछ भी न बिगड़ेगा,
हँसाता मैं रहूँ सबको खुदा इतने हुनर देना|
बहुत से लोग ऐसे है जिन्हें दिखती नहीं मंजिल,
इलाही सच कहूँ तो अब उन्हे छोटा शहर देना|
सुना है खाब सुबहों के हमेशा सच निकलते हैं,
तो सोने को खुदा मेरे जरा अंतिम पहर देना|
बहुत मुश्किल है' राहों के अदावत साज हो जाना,
ठहरने को मगर मुझको जरा कोई शजर देना||
✍©अतुल कुमार यादव
तुम्हें लिखता रहूँ पैगाम बस इतनी नजर देना|
हमारे अश्क जो बरसात से दिखते हैं' आँखों में,
हमेशा ही लबों पर तुम हँसी-शय का असर देना|
किसी की बद्ददुआओं से मेरा कुछ भी न बिगड़ेगा,
हँसाता मैं रहूँ सबको खुदा इतने हुनर देना|
बहुत से लोग ऐसे है जिन्हें दिखती नहीं मंजिल,
इलाही सच कहूँ तो अब उन्हे छोटा शहर देना|
सुना है खाब सुबहों के हमेशा सच निकलते हैं,
तो सोने को खुदा मेरे जरा अंतिम पहर देना|
बहुत मुश्किल है' राहों के अदावत साज हो जाना,
ठहरने को मगर मुझको जरा कोई शजर देना||
✍©अतुल कुमार यादव