Friday, 30 December 2016

सफर पर जा रहा हूँ मैं

सफर पर जा रहा हूँ मैं यही सबको खबर देना,
तुम्हें लिखता रहूँ पैगाम बस इतनी नजर देना|

हमारे अश्क जो बरसात से दिखते हैं' आँखों में,
हमेशा ही लबों पर तुम हँसी-शय का असर देना|

किसी की बद्ददुआओं से मेरा कुछ भी न बिगड़ेगा,
हँसाता मैं रहूँ सबको खुदा इतने हुनर देना|

बहुत से लोग ऐसे है जिन्हें दिखती नहीं मंजिल,
इलाही सच कहूँ तो अब उन्हे छोटा शहर देना|

सुना है खाब सुबहों के हमेशा सच निकलते हैं,
तो सोने को खुदा मेरे जरा अंतिम पहर देना|

बहुत मुश्किल है' राहों के अदावत साज हो जाना,
ठहरने को मगर मुझको जरा कोई शजर देना||
                                     ✍©अतुल कुमार यादव

Saturday, 17 December 2016

ग़ज़ल : हमें ही निशाना बनाने लगें हैं

हमें ही निशाना बनाने लगें हैं,
हमें ही शिकारी बताने लगें हैं।

हुनर कस रहें हैं कसौटी पे' जो भी,
बहुत याद मुझको वो आने लगें हैं।

दिली शुक्रिया मैं उन्हें दे रहा हूँ,
मुझे जो भी' हीरा बताने लगें हैं।

परिन्दों सा' पर है नया सा नशा है,
मगर पाँव बाँधें उड़ाने लगें हैं।

फ़लक तक पहुँचना रहा मेरा' मक़सद,
मुझे ही निशाना बनाने लगें हैं।

कहीं काट डाले गये पर हमारे,
कहीं हौसला वो गिराने लगें हैं।

बड़े प्यार से तो शिखर को छुआ था,
शिखर से अतुल अब हटाने लगें है।।
                      ©अतुल कुमार यादव