यादों में वो सिमट सिमट कर जाने कैसे सोयी होगी,
रात अकेले बेसुध लड़की जाने कितना रोयी होगी।
यादों के तुफानों ने कल कितने मंजर बदले होंगे,
सतरंगी यादों केे पन्नें जाने कितने फिसले होंगे,
हँसने वाले अधरों से भी शब्द आह के निकले होंगे,
आँखों के आँसू में डूबे कितने पत्थर पिघले होंगे,
दर्दों सेे आलिंगन करके जाने कितना रोयी होगी,
यादों में वो सिमट सिमट कर जाने कैसे सोयी होगी।
वो खिड़की से छुप छुपकर के मुझको देखा करती थी,
नज़रों के मिल जाने भर से चुपके चुपके हँसती थी,
जब मिलने की बारी आती घर समाज से डरती थी,
ठहरे ठहरे एक बिन्दु पर जग को कोसा करती थी,
सूरज चाँद सितारों में अब जाने कितना खोया होगी
यादों में वो सिमट सिमट कर जाने कैसे सोयी होगी।
वो अल्हड़ थी मतवाली थी वो थोड़े नखरे वाली थी,
वो चंचल थी शर्मिली थी नाजों से पलने वाली थी,
बारिश की वो बूँदें थी रंगों में ढलने वाली थी,
कटकर सबसे अलग राह पर दुनिया में चलने वाली थी,
मन के अब मतभेदों में वो जाने कितना खोयी होगी,
यादों में वो सिमट सिमट कर जाने कैसे सोयी होगी।
खाली खाली खुद को पाकर कैसेे खुद सम्भाली होगी,
दुख की चादर हटा हटा कर सुख में कैसे ढाली होगी,
गम के दरिया में खुशियों को कैसे भीतर पाली होगी,
घुट घुट कर जहर पीया तो कैसे मनी दिवाली होगी,
सिसक सिसक कर रात रात भर बच्चों जैसे रोयी होगी,
यादों में वो सिमट सिमट कर जाने कैसे सोयी होगी।
यादों में वो सिमट सिमट कर जाने कैसे सोयी होगी,
रात अकेले बेसुध लड़की जाने कितना रोयी होगी।।
©अतुल कुमार यादव
रात अकेले बेसुध लड़की जाने कितना रोयी होगी।
सतरंगी यादों केे पन्नें जाने कितने फिसले होंगे,
हँसने वाले अधरों से भी शब्द आह के निकले होंगे,
आँखों के आँसू में डूबे कितने पत्थर पिघले होंगे,
दर्दों सेे आलिंगन करके जाने कितना रोयी होगी,
यादों में वो सिमट सिमट कर जाने कैसे सोयी होगी।
नज़रों के मिल जाने भर से चुपके चुपके हँसती थी,
जब मिलने की बारी आती घर समाज से डरती थी,
ठहरे ठहरे एक बिन्दु पर जग को कोसा करती थी,
सूरज चाँद सितारों में अब जाने कितना खोया होगी
यादों में वो सिमट सिमट कर जाने कैसे सोयी होगी।
वो चंचल थी शर्मिली थी नाजों से पलने वाली थी,
बारिश की वो बूँदें थी रंगों में ढलने वाली थी,
कटकर सबसे अलग राह पर दुनिया में चलने वाली थी,
मन के अब मतभेदों में वो जाने कितना खोयी होगी,
यादों में वो सिमट सिमट कर जाने कैसे सोयी होगी।
दुख की चादर हटा हटा कर सुख में कैसे ढाली होगी,
गम के दरिया में खुशियों को कैसे भीतर पाली होगी,
घुट घुट कर जहर पीया तो कैसे मनी दिवाली होगी,
सिसक सिसक कर रात रात भर बच्चों जैसे रोयी होगी,
यादों में वो सिमट सिमट कर जाने कैसे सोयी होगी।
रात अकेले बेसुध लड़की जाने कितना रोयी होगी।।
©अतुल कुमार यादव