मन अपने से हारा है तो मैं अपनों से हारा हूँ,
जग की नजरों में मैं तो आवारा था आवारा हूँ।
सारी उम्र गुजारी हमने गाँव गली चौराहों पर,
इक इक शब्द लिखा फिर हमने आँसू पीड़ा आहों पर,
उल्लासित मन कंपित सा तन आज दुखी हो बैठा है,
आँसू अब गंगाजल होकर अपनी राहें खो बैठा है,
इसमें मेरा दोष नहीं है मैं किस्मत का मारा हूँ,
जग की नजरों में मैं तो आवारा था आवारा हूँ।
दुनिया चाहे जो कुछ सोचे मैं विचार का धागा हूँ,
अपनी धुन में रहने वाला मैं तो एक अभागा हूँ,
नहीं फर्क पड़ता है मुझको जग के ताने बाने से,
नहीं विकल होता हूँ मैं अब अपने दोष गिनाने से,
आसमान का टूटा मानो मैं तो एक सितारा हूँ,
जग की नजरों में मैं तो आवारा था आवारा हूँ।
नमक लगाना जख्मों पर तो इस दुनिया की आदत है,
मरहम रखना जख्मों पर तो झूठी एक कहावत है,
पाकर भेद अनूठा मन में एक अलग सी उलझन है,
ह्रदय दिवाकर सम दीपों के संबंधों से अनबन है,
छोड़ दिया उस जग को मैंने जिस जग का दुत्कारा हूँ,
जग की नजरों में मैं तो आवारा था आवारा हूँ।
मचल उठे कुछ दर्द नए अधरों से बाहर आने को,
सूख गए आंखों के आंसू मेरा साथ निभाने को,
पीड़ाओं से हाथ मिला कर कदम बढ़ा बदलावों को,
खामोश निगाहें देख रही हैं जीवन की आशाओं को,
हारा नहीं नहीं मैं हारा मैं जीवन की धारा हूँ,
जग की नजरों में मैं तो आवारा था आवारा हूँ।
©अतुल कुमार यादव